शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

कृष्ण के लिए पृथ्वी से परे कोई लोक नहीं

कृष्ण को छोड़कर दुनिया के समस्त अद्भुत व्यक्ति चाहे महावीर, चाहे बुद्ध, चाहे क्राइस्ट या कोई और हो। यह सभी परलोक के लिए जी रहे थे। उनका जीवन इस  दुनिया के बजाय एक काल्पनिक दुनिया के लिए, परलोक के लिए, मोक्ष के लिए या फिर स्वर्ग के लिए था। मनुष्य का पूरा अतीत इतनी पीडा, इतनी सफरिंग इतनी कठिनाईयों का था कि इस पृथ्वी के जीवन को स्वीकार करना मुश्किल था। ऐसे में अतीत के सभी धर्म पृथ्वी को अस्वीकार करने वाले धर्म हैं। सिवाय कृष्ण को छोड़कर। कृष्ण इस पृथ्वी को पूरे जीवन के साथ स्वीकार करते हैं। वे किसी परलोक में जीने वाले व्यक्ति नहीं, इसी पृथ्वी पर, इसी लोक में जीने वाले व्यक्ति हैं। बुद्ध, महावीर और क्राइस्ट  का मोक्ष इस पृथ्वी के पार कहीं दूर है, कृष्ण का मोक्ष इसी पृथ्वी पर यहीं और अभी है।

गुरुवार, 16 जून 2011

कार्ल मार्क्स की यादगार और प्रेरक कविता

इतनी चमक दमक
के बावजूद
तुम्हारे दिन तुम्हारे जीवन
को सजीव बना देने के इतने सवालो
के बावजूद
तुम इतने अकेले क्यों हो
मेरे दोस्त

जिस नौजवान को
कविताएं लिखने और
बहसों में शामिल रहना था
वो आज सडको पर लोगो से एक सवाल
पूछता फिर रहा है
की महाशय आपके पास क्या मेरे लिए कोई
कोई काम है

वो नवयुवती जिसके हक में
जिंदगी की सारी खुशिया होनी चाहिए थी
वो इतनी सहमी सहमी
और नाराज क्यों है

अदम्य रौशनी के
बाकी विचार भी
जब अँधेरे बादलों
से आच्छादित है
जवाब मेरे दोस्त
हवाओ में तैर रहे है

जैसे हर किसी को
रोज खाना चाहिए
नारी को चाहिए
अपना अधिकार
कलाकार को चाहिए
रंग और तुलिका
उसी तरह
हमारे समय के संकट को चाहिए
एक विचार और आह्वान

अंतहीन संघर्षो, अनंत उत्तेजनावो
सपनो में बंधे
मत ढालो यथास्थिथि के अनुसार
मोडो दुनिया को अपनी ओर
समो लो अपने भीतर
समस्त ज्ञान
घुटनों के बल मत रैंगो
उठो
गीत, कला और सच्चाई की
तमाम गहराइयों की थाह लो.

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

दर्द दिल मे लिए


होली आते ही जो चरित्र सबसे पहले आँखों के आगे आता है वो है कृष्ण का। मुस्कुराते , होठो से बांसुरी लगाये हुए मस्ती के आलम में होली खेलते कृष्ण। लगता है कि दुःख तकलीफ और सांसारिक बन्धनों से कहीं दूर है कृष्ण। लेकिन मुझे लगता है कि जीवन भर कृष्ण ने खोने के सिवा पाया कुछ भी नहीं। उनकी मुस्कराहट ने किसी को ये सोचने का मौका ही नहीं दिया कि कारागार में जन्म लेकर अपनी जननी को, बड़े होते ही प्रेमिका और मित्रो समेत अपनी माँ यशोदा को खोने वाला कृष्ण कभी दुखी भी हुआ या नहीं। शायद इसीलिए उन्हें छलिया कहा गया है।



दर्द दिल में लिए कृष्ण चल तो दिए,
मुस्कुराते रहे हर घडी ।
आंसुओ पे उन्हें था भरोसा बहुत,
ना बहे ना बहे वो कभी।
दर्द दिल में लिए कृष्ण ..........


तेज कदमो से आगे बढे वो मगर,
भारी मन हो सका ना किसी से जुदा।
वो तड़पते रहे आगे बढ़ते रहे,
सोचकर अब नहीं होगा मिलना मेरा।

याद आई सभी की जहां भी गए।
हाल मन का वहां पर वो किससे कहें ,
कोई समझे नहीं इसलिए सब सहा
दर्द सहकर भी वो मुस्कुराते रहे ।

ढूंढा सारा महल, खोजा सारा नगर,
शांत चित्त हो सका ना कहीं भी मगर,
जब भी यमुना कि लहरों पे नजरें पड़ीं ,
ग्वाल बाले सभी याद आने लगे।

थी तपन धुप की दूर उनसे बहुत,
याद आता रहा माँ का आँचल बहुत,
छाँव भी धुप सी उनको तीखी लगी,
जब दिखी ना कहीं माँ वो अंचल लिए।

उनकी मुरली कि धुन पे तो नाचा जगत,
हाल मन का नहीं कोई समझा मगर,
कष्ट मन का जो जागा मधुर हो गया,
जब हो तनहा वो मुरली बजाने लगे।

इस जगत ने कहा कृष्ण क्यों चल दिए,
छोड़ कर उन सभी को जो उनके ही थे,
पाया क्या कृष्ण ने जो चले छोड़ कर ,
उम्र भर वो जिए सबको खोते हुए।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

अवसरवादी राजनीति के मोहरे और हम

रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे लोगों पर रात के डेढ़ बजे लाठीचार्ज. सैकड़ों घायल कुछ कि हालत गंभीर. बाबा रामदेव भक्तों अनुयायियों को पिटता छोड़ महिला वस्त्र धारण कर घटना स्थल से पलायन कर जाते है. घटना को लेकर देश भर में प्रदर्शन केंद्र सरकार कि चारो तरफ आलोचना. कांग्रेस पार्टी की तरफ से पहली आक्रामक सफाई मुस्लिम जनसभा में दे जाती है. जिसमे राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव और संघ परिवार पर गंभीर आरोप लगते है. बीजेपी योग गुरु पर लाठी चार्ज के खिलाफ राजघाट पर सांकेतिक प्रदर्शन करती है जिसमे पार्टी पदाधिकारियों आक्रोश के चेहरे से आक्रोश गायब था. उनके नाच गाने से कुछ और ही संकेत मिल रहे थे.
ध्यान से देखें तो इस प्रकरण में सरकार और रामदेव सिर्फ दो पक्ष नहीं चार पक्ष है. कांग्रेस यानी सोनिया राहुल लौबी जिसमे दिग्विजय सिंह भी है, बाबा रामदेव, बीजेपी और केंद्र सरकार यानि मनमोहन सिंह. दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित कार्यवाही को लेकर अनभिज्ञता जाता चुकी है. यानी घटना में गाँधी परिवार के करीबी गृह मंत्रालय की भूमिका हो सकती है.
रात के अँधेरे में लाठी चार्ज के लिए सबसे ज्यादा फजीहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हुई. देश ही नहीं विदेशों में भी सवाल पूछे गए. दूसरी तरफ गिरफ्तारी से डरे सहमे भागते हुए बाबा रामदेव की तस्वीरो ने उनकी छवि को नुक्सान पहुचाया. सबसे ज्यादा नुक्सान उनकी राजनितिक महत्व आकांछा को हुआ.
इस घटना का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी और कांग्रेस पार्टी को हुआ. कांग्रेस अपने मिशन २०१२ के लिए युवराज राहुल को तैयार कर चुकी है. इसके आड़े आ रही है मनमोहन सिंह की इमानदार और बेदाग़ छवि. इसी छवि को लोगों ने पिचले चुनावो में चुना था. यह छवि जितनी बदनाम होगी उतनी सहजता से उन्हें हटाया जा सकेगा. भ्रश्ताचारियीं को बचाने का आरोप उन पर पहले ही लग चूका है, अब लोकतंत्र को कलंकित करने का आरोप भी उन्ही के माथे मढ़ा गया. धीरे धीरे मनमोहन सिंह जनता के बीच अस्वीकार्य होते जा रहे है. इससे अलग कांग्रेस पार्टी घटना के बाद सरकार का बचाव करने के बजाय बैंक की जुगत में लगी हुई थी. बाबा के मंच पर साध्वी ऋतंभरा की मोजुदगी ने मुसलमानों को निराश किया था. लिहाजा दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी की तरफ से पहली सफाई पूरे मुस्लिम भेष भूषा में मुस्लिम जनसभा में दी. इस दोरान उन्होंने बाबा और संघ परिवार पर
रामलीला मैदान में सत्याग्रह कर रहे लोगों पर रात के डेढ़ बजे लाठीचार्ज. सैकड़ों घायल कुछ कि हालत गंभीर. बाबा रामदेव भक्तों अनुयायियों को पिटता छोड़ महिला वस्त्र धारण कर घटना स्थल से पलायन कर जाते है. घटना को लेकर देश भर में प्रदर्शन केंद्र सरकार कि चारो तरफ आलोचना. कांग्रेस पार्टी की तरफ से पहली आक्रामक सफाई मुस्लिम जनसभा में दे जाती है. जिसमे राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव और संघ परिवार पर गंभीर आरोप लगते है. बीजेपी योग गुरु पर लाठी चार्ज के खिलाफ राजघाट पर सांकेतिक प्रदर्शन करती है जिसमे पार्टी पदाधिकारियों आक्रोश के चेहरे से आक्रोश गायब था. उनके नाच गाने से कुछ और ही संकेत मिल रहे थे.
ध्यान से देखें तो इस प्रकरण में सरकार और रामदेव सिर्फ दो पक्ष नहीं चार पक्ष है. कांग्रेस यानी सोनिया राहुल लौबी जिसमे दिग्विजय सिंह भी है, बाबा रामदेव, बीजेपी और केंद्र सरकार यानि मनमोहन सिंह. दिल्ली की मुख्य मंत्री शीला दीक्षित कार्यवाही को लेकर अनभिज्ञता जाता चुकी है. यानी घटना में गाँधी परिवार के करीबी गृह मंत्रालय की भूमिका हो सकती है.
रात के अँधेरे में लाठी चार्ज के लिए सबसे ज्यादा फजीहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हुई. देश ही नहीं विदेशों में भी सवाल पूछे गए. दूसरी तरफ गिरफ्तारी से डरे सहमे भागते हुए बाबा रामदेव की तस्वीरो ने उनकी छवि को नुक्सान पहुचाया. सबसे ज्यादा नुक्सान उनकी राजनितिक महत्व आकांछा को हुआ.
इस घटना का सबसे ज्यादा फायदा बीजेपी और कांग्रेस पार्टी को हुआ. कांग्रेस अपने मिशन २०१२ के लिए युवराज राहुल को तैयार कर चुकी है. इसके आड़े आ रही है मनमोहन सिंह की इमानदार और बेदाग़ छवि. इसी छवि को लोगों ने पिचले चुनावो में चुना था. यह छवि जितनी बदनाम होगी उतनी सहजता से उन्हें हटाया जा सकेगा. भ्रश्ताचारियीं को बचाने का आरोप उन पर पहले ही लग चूका है, अब लोकतंत्र को कलंकित करने का आरोप भी उन्ही के माथे मढ़ा गया. धीरे धीरे मनमोहन सिंह जनता के बीच अस्वीकार्य होते जा रहे है. इससे अलग कांग्रेस पार्टी घटना के बाद सरकार का बचाव करने के बजाय बैंक की जुगत में लगी हुई थी. बाबा के मंच पर साध्वी ऋतंभरा की मोजुदगी ने मुसलमानों को निराश किया था. लिहाजा दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी की तरफ से पहली सफाई पूरे मुस्लिम भेष भूषा में मुस्लिम जनसभा में दी. इस दोरान उन्होंने बाबा और संघ परिवार पर तीखे आरोप लगाये .कोंग्रेस रणनीति कारों को लगता है किस इस घटना के बाद मुसलमानों के एक बड़े तबके को चुनाव के दौरान वोट में तब्दील किया जा सकता है .

घटना के बाद बीजेपी को भी दूरगामी लाभ हुआ. बाबा रामदेव अपनी अलग पार्टी बना कर चुनाव लड़ना चाहते थे. उनकी इस राजनैतिक महत्वाकांक्षा से आर एस एस और भाजपा मे खलबली मची हुई थी इसी बीच काला धन को लेकर बाबा रामदेव के धरने ने पुरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया अगर धरना सफल हो जाता तो उनकी छवि राष्ट्र नायक की होती जिसका सीधा लाभ उनकी बनने वाली पार्टी को होता चुनाव में वो सिर्फ भाजपा का ही वोट काटते कभी भाजपा के पीछे खड़ा होने वाला संत समाज बाबा के मंच पर दिखने लगा लाठी चार्ज की घटना के बाद जिस तरह बाबा औरतों के कपडे पहन के भागे उससे उनकी बहुत किरकिरी हुई संत समाज ने उन्हें बहिष्कृत करने की घोषणा की वही रामदेव की पिटाई से आक्रोशित हिंदू मन भाजपा से जुड गया

घटना के बाद भाजपा के प्रदर्शन में तेवर गायब थे आक्रोषित मन किसी भी गाने पर मुस्कुराते हुए नांच नहीं सकता चेहरे और शारीरिक हाव भाव किन्ही विशेष आयोजनों का संकेत देते हैं तो क्या राजनैतिक नफा नुक्सान का आंकलन कर इस लाठी चार्ज के लिए विपक्ष की मौन सहमति थी .किसी शायर की ये दो पंक्तियाँ और बात खत्म

खून के दाग हैं जहाँ संतों के दामन पर

तू वाहन कौन से नानक को सदा देता है

तू खड़ा हो के कहाँ मांग रहा है रोटी

यह सियासत का शहर है

सिर्फ दगा देता है



जब दुखी हो




क्या करें किससे कहें ?
आगोश में किसकी,
ये अपना सर रखें,
रोते रहें रोते रहें ?



जब दुखी हो, राह न हो।
हार ही हो हर डगर पर।
जब लगे कुछ भी नही है जगत में ।
और भार है तू जगत पर।

और जब हर बात जग की ,
तीर सी तीखी ।
जब लगे की जिंदगी है,
कट रही एहसान पर।
जब दर्द से तेरा ह्रदय ,
भर कर छलकने सा लगे।
जब ये जगत देखे दया के साथ तुझको ।
और तू रोये स्वयं के हाल पर।

जब लगे सम्मान तेरा
खो गया इस भीड़ में ।
जब तेरी आँखों के
आंसू बह चले हर बात पर।
दूर तक देखो मगर
जब कोई अपना न मिले ।
दूर तक ढूंढो मगर जब
धुंध ही केवल दिखे।

जब तुम्हे इस जिंदगी का
मोह थमता सा लगे ।
जब तुम्हे विश्वास न हो
स्वयं अपने आप पर।

जब तेरी आँखों के आगे
हो अँधेरा हर समय ।
और कांटे ही मिले तुझको
तेरी हर राह पर।
जिंदगी में जब भविष्यत् के
लिए न सोच पावो।
और कहने के लिए
जब भूत की असफलताएं हो।

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

जीवन की उदासी





आज जीवन की उदासी से नही लड़ पा रहा हूँ
कैद हूँ मै इस उदासी में न हंस न रो सका
लिख रहा हूँ गीत गम के और गाता जा रहा हूँ
आज जीवन की उदासी से नही लड़ पा रहा हूँ .......








जन्म क्यों लेता है क्या उद्देश्य है इस जन्म का ?
जिंदगी की इस डगर या पथिक हूँ मै मृत्यु का ?
है प्राप्त करना क्या मुझे हूँ अर्थ बिन तो मै नही ?
भागते से लोग दीखते खो न जाऊँ मै कहीं ।
जाना कहा है ? किसलिए ? आखिर कहाँ मै जा रहा हूँ ?
आज जीवन की उदासी और नही लड़ पा रहा हूँ .........


जन्म लेकर जिंदगी की जंग मै शामिल हुआ ।
मारा गया सौ बार मै लेकिन अभी भी जी रहा हूँ ।
युद्घ का विध्वंस मैंने ही किया खुश हो मगर ।
जिंदगी के चक्र व्यूहों से निकल ना पा रहा हूँ।
बैठ कर तन्हाइयों में मै उदासी से लड़ा पर ।
आज जीवन की उदासी से नही लड़ पा रहा हूँ।


सोचता हूँ जन्म क्या है और मरना क्याबला ?
क्या बचपना, क्या काल यूँ और बुढापा मृत्यु क्या ।
नहीं सोचता हूँ साथ को था संग को है को रहेगा ।
सोचता हूँ साथ तन का क्या निरंतर दे सकूँगा ।
जन्म लेकर कौन जिया है सदा ये सोचकर ।
जिंदगी से मोह अपना भंग करता जा रहा हूँ ।
बैठ कर तनहाइयों में मई उदासी से लड़ा पर ।
आज जीवन की उदासी से नही लड़ पा रहा हूँ ।

क्या खुशी का जश्न और शोके सभा होती है क्या ?
एक दिन की बात न पूछेगा कोई कल यहाँ ।
किसलिए था खुश हुआ और किसलिए हूँ रो रहा ?
बदलाव होगा आंसुओ से ना खुशी से कुछ यहाँ ।
ये खुशी कितने समय की और गम की उम्र क्या ?
नाश होना जब सभी का फिर क्यों इसमे खो रहा हूँ ?
बैठकर तनहाइयों में मई उदासी से लड़ा पर ।
आज जीवन की उदासी से नही लड़ पा रहा हूँ ।

स्वस्थ है न पास मेरे धैर्य भी अब थक चुका ।
ना ह्रदय में शान्ति शक्ति सब यहाँ पर खो चुका ।
हीन हूँ संतोष से है हर्ष का भण्डार जो ।
आज थक कर चाहता हूँ छोड़ना संसार को ।
रहित रस से रूदन जीवन का नही अब सुन सकूँगा ।
इसलिए जीवन से अब मई अलग होता जा रहा हूँ ।
बैठकर तनहाइयों में मै रूदन सुनता रहा पर ।
आज जीवन के रूदन को मै नही सह पा रहा हूँ ।
आज जीवन ................. ... ... ... ... ... .... ... ... ...... ...

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

क्या लिखूं


क्या लिखूं जब शांत चित्त मेरा नही है ,
तन कहीं है और मेरा मन कहीं है।
किस तरह अब रण विजय बोलो करूँगा,
सर कहीं है और मेरा धड कहीं है।

सोचता हूँ कुछ, कभी कुछ और कुछ ,
पर ठहरता है नही मन में कभी कुछ ।
ऐश्वर्या देखा और पल में पतन भी ,
अनंत पर निकले अभी और थक गया ये तन कभी।
कभी रोया और हंसने भी लगा मै आप ही ,
कारण वही था और न बदली ही कोई बात थी।
कभी मंजिल कि तरफ़ मै बढ़ गया निर्भीक हो,
कभी डरकर पूछने मै लगा ख़ुद से कौन हो।
यों ही मिलती है मुझे संसार कि सारी खुशी,
और पल मे जाने क्यों यों ही मेरा मन है दुखी ।
कभि शांत चित्त मेरा हृदय, मुझको परम संतोष है ,
कभि प्राप्त करना विश्व का मुझको समस्त ऐश्वर्या है।

इसी द्विविधा के बवंडर में मेरे अस्तित्व की,
छत कहीं है और दीवारे कही है।
क्या लिखूं जब शांत चित्त मेरा नही है ,
तन कहीं है और मेरा मन कहीं है।